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गढ़वाल हिमालय में कृषि वानिकी – गढ़वाल हिमालय के पहाड़ी गांवों में एक आम कहानी है — खेत हैं, मेहनत है, पसीना बहता है, लेकिन जेब में पैसा नहीं आता। पारंपरिक खेती से गुजारा तो हो जाता है, मगर आय इतनी नहीं होती कि परिवार की सभी जरूरतें पूरी हो सकें। पलायन का दर्द इन पहाड़ों की हर पगडंडी पर दिखता है — बंद पड़े घर, वीरान खेत, और शहरों की तरफ भागती नई पीढ़ी।
लेकिन अगर कोई कहे कि इन्हीं पहाड़ी खेतों से अदरक, हल्दी, रोजमेरी और तेजपत्ता जैसी फसलें उगाकर लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं, तो? यही सपना साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है — हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल) के वानिकी एवं प्राकृतिक संसाधन विभाग द्वारा।
दिनांक 30 मार्च 2026 को एक दिवसीय किसान जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें 16 से अधिक गांवों के 70 से ज्यादा किसानों ने हिस्सा लिया। यह कार्यशाला भारत सरकार के सुपारी एवं मसाला विकास निदेशालय (DASD), कालीकट द्वारा वित्तपोषित परियोजना — “गढ़वाल हिमालय में आय सृजन के लिए मसाला एवं सुगंधित पौधों पर आधारित कृषि वानिकी मॉडल” — के अंतर्गत आयोजित की गई।
आइए, विस्तार से जानते हैं कि यह कार्यशाला क्या थी, इसमें क्या सिखाया गया, और गढ़वाल के किसानों के लिए यह क्यों एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
कार्यशाला का उद्देश्य — पहाड़ी खेती को वैज्ञानिक दिशा देना
इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक था — गढ़वाल हिमालय की भौगोलिक और पारिस्थितिक परिस्थितियों के अनुकूल उच्च मूल्य वाली मसाला एवं सुगंधित फसलों को कृषि वानिकी प्रणाली (Agroforestry System) में वैज्ञानिक ढंग से एकीकृत करना।
सीधे शब्दों में कहें तो — पहाड़ी किसानों को यह समझाना कि कैसे वे अपने पारंपरिक वृक्षों के साथ-साथ अदरक, हल्दी, रोजमेरी और तेजपत्ता जैसी फसलें उगाकर वर्षभर विविध स्रोतों से आय प्राप्त कर सकते हैं। यह केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि एक बहु-स्तरीय कृषि प्रणाली का व्यावहारिक प्रदर्शन था।
परियोजना की पृष्ठभूमि — कौन चला रहा है यह मिशन?
यह परियोजना भारत सरकार के सुपारी एवं मसाला विकास निदेशालय (Directorate of Arecanut and Spices Development – DASD) द्वारा वित्तपोषित है। DASD, जिसका मुख्यालय कालीकट (केरल) में है, देश भर में मसाला फसलों के विकास, अनुसंधान और किसान प्रशिक्षण के लिए जाना जाता है। यह निदेशालय विभिन्न राज्यों में ऐसी परियोजनाओं को फंड करता है जो स्थानीय जलवायु के अनुसार मसाला फसलों की खेती को बढ़ावा दें।
गढ़वाल हिमालय के लिए इस परियोजना का संचालन हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के वानिकी एवं प्राकृतिक संसाधन विभाग द्वारा किया जा रहा है। परियोजना के मुख्य अन्वेषक (Principal Investigator) हैं प्रो. मुनेश कुमार, जो वानिकी, कृषि वानिकी, कार्बन प्रच्छादन और हिमालयी पारिस्थितिकी के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त वैज्ञानिक हैं। उनके 150 से अधिक शोध पत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।
कार्यशाला में कौन-कौन शामिल हुआ?
किसान प्रतिभागी
इस प्रशिक्षण में गढ़वाल क्षेत्र के विभिन्न गांवों — थाती डागर, पिल्खी, मढ़ी, चौकी, मरगांव, धरकोट, सुपाना, उलाना, मालूपानी, लूसी, जाखी, धल्टुग, मंगसू, सिल्काखाल, बड़ियारगढ़ और कंडोली — से 70 से अधिक किसानों ने भाग लिया। इतने सारे गांवों से किसानों का आना यह दर्शाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में वैकल्पिक आय स्रोतों की कितनी गहरी जरूरत है।

विशेषज्ञ एवं शिक्षाविद
कार्यशाला में कई प्रतिष्ठित बाह्य एवं आंतरिक विशेषज्ञों ने अपना ज्ञान साझा किया:
बाह्य विशेषज्ञ:
- डॉ. सुभाष नौटियाल — सेवानिवृत्त वैज्ञानिक, वन अनुसंधान संस्थान (FRI), देहरादून
- डॉ. बी.एस. बुटोला — कॉलेज ऑफ फॉरेस्ट्री, रानीचौरी (VCSG उत्तराखंड विश्वविद्यालय)
- डॉ. के. चंद्रशेखर — वैज्ञानिक एफ, जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान
- डॉ. विष्णुदत्त कुकरेती — सामाजिक कार्यकर्ता एवं सामुदायिक विकास विशेषज्ञ
- डॉ. प्रीति सिंह — SUBHAG Himalayan Resources, श्रीनगर गढ़वाल
- नीरज बलूनी — क्षेत्रीय विशेषज्ञ
विश्वविद्यालय प्रतिनिधि:
- प्रो. ए.के. नेगी — डीन, स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड एलाइड साइंस
- प्रो. एम.एस. पंवार — डीन, नियुक्ति एवं प्रमोशन
- प्रो. आर.के. मैखुरी — वरिष्ठ वानिकी वैज्ञानिक
- डॉ. डी.एस. चौहान — विभागाध्यक्ष, वानिकी विभाग
- डॉ. डी.के. राणा — विभागाध्यक्ष, उद्यानिकी विभाग
- डॉ. तेजपाल बिष्ट, डॉ. विजयकांत पुरोहित, डॉ. आर.एस. नेगी, डॉ. हिमसिखा गुसाईं और अन्य

क्या सिखाया गया कार्यशाला में? — फसलवार विस्तृत जानकारी
अदरक और हल्दी — पारंपरिक ताकत, आधुनिक तकनीक
परियोजना अन्वेषक प्रो. मुनेश कुमार ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि अदरक और हल्दी जैसी पारंपरिक मसाला फसलें गढ़वाल की जलवायु और भू-आकृतिक परिस्थितियों के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल हैं। ये फसलें यहां सदियों से उगाई जा रही हैं, लेकिन वैज्ञानिक तरीकों से इनकी उपज और गुणवत्ता को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
प्रो. आर.के. मैखुरी और डॉ. डी.एस. चौहान ने अदरक और हल्दी की उन्नत उत्पादन तकनीकों पर विस्तृत जानकारी दी, जिसमें शामिल थे:
- गुणवत्तापूर्ण बीज (रोपण सामग्री) का चयन
- उन्नत किस्मों की पहचान
- मृदा और पोषक तत्व प्रबंधन
- कीट-रोग नियंत्रण के वैज्ञानिक उपाय
- फसल कटाई के बाद प्रसंस्करण और भंडारण

रोजमेरी — पहाड़ों का “हरा सोना”
कार्यशाला का सबसे रोमांचक हिस्सा था रोजमेरी (Rosemary) की खेती पर चर्चा। डॉ. विष्णुदत्त कुकरेती और डॉ. प्रीति सिंह (SUBHAG Himalayan Resources) ने रोजमेरी की व्यावसायिक खेती को एक उभरते हुए उद्यम के रूप में प्रस्तुत किया।
रोजमेरी को लेकर किसानों को जो सबसे बड़ी राहत की बात बताई गई, वह यह थी कि इसकी बाय-बैक मॉडल (Buy-Back Model) के तहत सुनिश्चित विपणन व्यवस्था उपलब्ध है। इसका मतलब — किसान को बाजार खोजने की चिंता नहीं, कंपनी ही फसल खरीदने आएगी।
डॉ. बी.एस. बुटोला (कॉलेज ऑफ फॉरेस्ट्री, रानीचौरी) और डॉ. के. चंद्रशेखर (जी.बी. पंत संस्थान) ने बताया कि रोजमेरी की खेती से हर्बल और कॉस्मेटिक उद्योगों के लिए कच्चा माल उपलब्ध होता है, जिसकी बाजार में लगातार बढ़ती मांग है। उन्होंने खेत स्तर पर व्यावहारिक प्रदर्शन भी किया, जिसमें रोजमेरी की रोपाई, देखभाल और कटाई की पूरी प्रक्रिया किसानों को दिखाई गई।
हाल ही में उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में भी रोजमेरी की खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। जिला योजना के तहत आठ गांवों में 13 हजार रोजमेरी के पौधे रोपे गए हैं, और किसानों को प्रति हेक्टेयर 60 से 100 लीटर तेल उत्पादन से सालाना लगभग 6 लाख रुपये की आय होने का अनुमान है।
तेजपत्ता — हिमालय की अनमोल विरासत
तेजपत्ता (Bay Leaf / Cinnamomum tamala) गढ़वाल हिमालय का एक पारंपरिक वन उत्पाद है, जो मसाले के रूप में पूरे भारत में प्रयोग किया जाता है। कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि तेजपत्ता को कृषि वानिकी मॉडल में शामिल करने से किसानों को वृक्षों से दीर्घकालिक आय मिलती है, जबकि नीचे की जमीन पर अदरक, हल्दी और रोजमेरी उगाई जा सकती है। यह एक बहु-स्तरीय उत्पादन प्रणाली है जो भूमि के हर इंच का उपयोग सुनिश्चित करती है।

कृषि वानिकी मॉडल — कैसे काम करता है?
प्रो. एम.एस. पंवार और डॉ. सुभाष नौटियाल (FRI) ने जोर देकर बताया कि कृषि वानिकी मॉडल एक ऐसी प्रणाली है जिसमें वृक्षों और फसलों को एक साथ एक ही भूमि पर उगाया जाता है। इसके प्रमुख लाभ हैं:
भूमि उत्पादकता में वृद्धि — एक ही खेत से कई फसलें और वृक्ष उत्पाद प्राप्त होते हैं। ऊपर की छतरी में तेजपत्ता या अन्य वृक्ष, बीच में रोजमेरी जैसी झाड़ीदार फसलें, और नीचे जमीन पर अदरक-हल्दी — यह तीन-स्तरीय उत्पादन प्रणाली है।
विविध आय स्रोत — किसान को वर्षभर अलग-अलग फसलों से आय मिलती रहती है। एक फसल खत्म होती है तो दूसरी तैयार होती है।
पारिस्थितिक संतुलन — वृक्ष मिट्टी की नमी बनाए रखते हैं, कटाव रोकते हैं, और सूक्ष्म जलवायु को अनुकूल बनाते हैं। यह पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
जोखिम में कमी — एक फसल खराब हो जाए तो अन्य फसलों से आय जारी रहती है।
उत्तराखंड में सुगंधित खेती का बड़ा विजन — एरोमा वैली और महक क्रांति
यह कार्यशाला उत्तराखंड सरकार की बड़ी नीति का भी हिस्सा है। राज्य सरकार “महक क्रांति” योजना के तहत सुगंधित पौधों की खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दे रही है। इसके अंतर्गत प्रदेश में 7 एरोमा वैली विकसित की जा रही हैं, जिनमें लेमनग्रास, मिंट, डेमेक्स रोज, रोजमेरी और अन्य सुगंधित फसलों की खेती शामिल है।
उत्तराखंड सगंध पौधा केंद्र (Centre for Aromatic Plants – CAP), सेलाकुई भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पंतनगर कृषि मेले में भी सुगंधित और मसाला फसलों को किसानों की आय बढ़ाने का प्रमुख साधन बताया था।
किसानों के लिए क्या हैं व्यावहारिक फायदे?
गढ़वाल हिमालय के किसानों के लिए इस कृषि वानिकी मॉडल के कई ठोस फायदे हैं:
कम लागत, अधिक मुनाफा — अदरक, हल्दी और रोजमेरी जैसी फसलों की खेती में रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम होती है। जैविक विधियों से इनकी खेती संभव है, जिससे लागत कम और उत्पाद का बाजार मूल्य अधिक मिलता है।
बाजार की गारंटी — रोजमेरी जैसी फसलों के लिए बाय-बैक मॉडल उपलब्ध है। हर्बल, कॉस्मेटिक और फार्मास्यूटिकल उद्योगों में इन उत्पादों की लगातार मांग है।
वन्यजीव संघर्ष से राहत — सुगंधित पौधों की तीखी गंध जंगली जानवरों को खेतों से दूर रखती है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बंदर, सुअर और भालू से फसल नुकसान एक बड़ी समस्या है, और सुगंधित फसलें इसका प्राकृतिक समाधान हैं।
पलायन रोकने में मदद — अगर किसानों को उनके गांवों में ही अच्छी आय मिलने लगे, तो युवाओं का शहरों की ओर पलायन कम होगा।
पर्यावरण संरक्षण — कृषि वानिकी मॉडल में वृक्ष लगाने से कार्बन प्रच्छादन बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता सुधरती है, और जल स्रोतों का संरक्षण होता है।
Pro Tips — पहाड़ी किसानों के लिए विशेष सुझाव
गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री — हमेशा प्रमाणित स्रोतों से बीज और पौधे खरीदें। HNB गढ़वाल विश्वविद्यालय, VCSG भरसार विश्वविद्यालय, या सगंध पौधा केंद्र सेलाकुई से संपर्क करें।
जैविक खेती अपनाएं — पहाड़ी मिट्टी स्वाभाविक रूप से उपजाऊ है। वर्मीकम्पोस्ट और जैव उर्वरकों का उपयोग करें। इससे उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ेगी और “ऑर्गेनिक” ब्रांडिंग से बाजार मूल्य अधिक मिलेगा।
किसान उत्पादक संगठन (FPO) बनाएं — अकेले खेती करने से बेहतर है कि गांव के किसान मिलकर FPO बनाएं। इससे सामूहिक बिक्री, बेहतर मोल-भाव और सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिलता है।
प्रसंस्करण सीखें — कच्ची फसल बेचने से कम मुनाफा होता है। अगर अदरक का पाउडर, हल्दी का पाउडर, या रोजमेरी का तेल निकालकर बेचें, तो मुनाफा कई गुना बढ़ सकता है।
सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं — उत्तराखंड सरकार की “महक क्रांति” योजना, मुख्यमंत्री राज्य कृषि विकास योजना, और DASD की विभिन्न परियोजनाओं के तहत सब्सिडी और तकनीकी सहायता उपलब्ध है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कृषि वानिकी मॉडल क्या है और यह पारंपरिक खेती से कैसे अलग है?
कृषि वानिकी (Agroforestry) एक ऐसी कृषि प्रणाली है जिसमें वृक्षों और फसलों को एक साथ एक ही भूमि पर उगाया जाता है। पारंपरिक खेती में आमतौर पर या तो सिर्फ फसलें उगाई जाती हैं या सिर्फ वृक्ष। कृषि वानिकी में दोनों को समन्वित किया जाता है, जिससे भूमि की उत्पादकता बढ़ती है और किसान को विविध स्रोतों से आय मिलती है।
2. गढ़वाल हिमालय में कौन-कौन सी मसाला और सुगंधित फसलें उगाई जा सकती हैं?
गढ़वाल की जलवायु अदरक, हल्दी, रोजमेरी, तेजपत्ता, बड़ी इलायची, दालचीनी, लेमनग्रास, तुलसी और कई अन्य औषधीय-सुगंधित पौधों के लिए अनुकूल है। इनमें से अदरक, हल्दी, रोजमेरी और तेजपत्ता को इस परियोजना में विशेष रूप से प्राथमिकता दी गई है।
3. रोजमेरी की खेती से कितनी आय हो सकती है?
रोजमेरी की खेती से प्रति हेक्टेयर 60 से 100 लीटर तेल का उत्पादन किया जा सकता है। मौजूदा बाजार दर पर रोजमेरी तेल लगभग 3,000 रुपये प्रति किलो बिकता है। इस हिसाब से किसान प्रति हेक्टेयर सालाना 3 से 6 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं। बाय-बैक मॉडल के कारण विपणन की चिंता भी नहीं रहती।
4. क्या इस परियोजना के तहत किसानों को मुफ्त प्रशिक्षण और रोपण सामग्री मिलती है?
हां, DASD द्वारा वित्तपोषित इस परियोजना के अंतर्गत किसानों को निःशुल्क प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। HNB गढ़वाल विश्वविद्यालय का वानिकी विभाग इस परियोजना का नोडल केंद्र है।
5. सुगंधित पौधों की खेती से जंगली जानवरों के नुकसान से कैसे बचाव होता है?
रोजमेरी, लेमनग्रास और तुलसी जैसे सुगंधित पौधों की तीखी गंध जंगली जानवरों जैसे बंदर, जंगली सुअर और भालू को प्राकृतिक रूप से खेतों से दूर रखती है। यह पहाड़ी क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष का एक प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल समाधान है।
6. हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय की इस परियोजना से कैसे जुड़ सकते हैं?
इच्छुक किसान हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल) के वानिकी एवं प्राकृतिक संसाधन विभाग से संपर्क कर सकते हैं। प्रो. मुनेश कुमार (परियोजना अन्वेषक) की टीम किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और रोपण सामग्री उपलब्ध कराने में सक्रिय है।
निष्कर्ष — पहाड़ की मिट्टी में छिपा है समृद्धि का बीज
गढ़वाल हिमालय के पहाड़ी किसानों के लिए यह कार्यशाला सिर्फ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं थी — यह एक नई सोच, नई दिशा और नई उम्मीद थी। अदरक, हल्दी, रोजमेरी और तेजपत्ता जैसी फसलों पर आधारित कृषि वानिकी मॉडल गढ़वाल के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने, पलायन रोकने और पर्वतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की क्षमता रखता है।
जरूरत है कि अधिक से अधिक किसान इस तरह की परियोजनाओं से जुड़ें, वैज्ञानिक तकनीकें अपनाएं, और अपनी पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ें। अगर ऐसा हुआ, तो वह दिन दूर नहीं जब गढ़वाल हिमालय की हर पहाड़ी ढलान से मसालों की खुशबू और किसानों की खुशहाली — दोनों एक साथ उठेंगी।
अगर आप उत्तराखंड के किसान हैं या पहाड़ी खेती में रुचि रखते हैं, तो इस लेख को अधिक से अधिक शेयर करें और अपने क्षेत्र के किसानों तक पहुंचाएं।
Useful Links:
- हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय आधिकारिक वेबसाइट: https://www.hnbgu.ac.in
- सुपारी एवं मसाला विकास निदेशालय (DASD): https://dasd.gov.in
- उत्तराखंड कृषि विभाग: https://agriculture.uk.gov.in
- उत्तराखंड सगंध पौधा केंद्र (CAP), सेलाकुई
